गुरु (निबंध) Mentor
गुरु की महिमा महान है
जो ना समझे तो नादान है।
गुरु और शिष्य का रिश्ता अंतर मन का रिश्ता है जो स्वतः जुड़ जाता हैं । एक मनुष्य अपने जीवन में अनेक प्रकार के लोगो से मिलता है । तरह तरह के कार्य सीखता है , विभिन्न विषयों पर विचारो को सुनता है । नाना प्रकार से समाज में लोगों की मदद को प्रस्तुत होता है । इसके साथ ही साथ अनेक विधियों से लोगो की मदद को तैयार रहता है। फिर भी वह उपरोक्त वर्णित व्यकित्यों को गुरु मानने को तैयार नहीं होता ऐसा क्यों ?
गुरु कुम्हार शिष्य कुंभ है
गढ़ गढ़ काढ़े खोट ।
गुरु के कृत्य केवल शिष्य के उन्नति के लिए होते हैं। मनुष्य कैसा भी हो दीक्षा लेने के उपरांत वह गुरु के पुत्र के समान होता है। इसलिए सदगुरु पिता और पुत्र के सम्बन्ध की तरह शिष्य को सन्मार्ग पर प्रेरित करते है।
गुरु अपने जप तप पुण्य धर्म कर्म के फल के द्वारा भी शिष्य का उद्धार और कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते है ।

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